Bhaktamar Stotra Sanskrit-11 [Mahima Path Lyrics]। भक्तामर स्तोत्र

Bhaktamar Stotra-11 Shloka/Mahima/Paath​

Sanskrit

दृष्ट्वा भवन्त- मनिमेष- विलोकनीयं

नान्यत्र तोष मुपयाति जनस्य चक्षुः ।

पीत्वा पयः शशिकर- द्युति- दुग्ध- सिन्धोः

क्षारं जलं जलनिधे रसितुं क इच्छेत्  ।11

English

Bhaktamar Stotra/Mahima/Paath Sanskrit No-11 with Hindi Meaning

BHAKTAMAR STOTRA 11 HINDI MEANING

Bhaktamar Strotra 1st Shloka । भक्तामर स्तोत्र श्लोक 11 (With Hindi meaning, lyrics, Paath, text, image presentation)

कड़े शब्दों के शब्दार्थ (Meaning of difficult Sanskrit words)​

अनिमेष- विलोकनीयं– बिना पलक झुकाए हुए देखने योग्य अर्थात् टकटकी लगाकर दर्शन करने योग्य ।
विशेषार्थ  –  (निमेष) आंख की पलकें, उससे रहित वही हुआ अनिमेष, उसके द्वारा (विलोकनीय) – दर्शनीय अर्थात् देखने योग्य ।
तात्पर्य यह कि आंख के परदे झुकाए बिना (टिमकार रहित) नेत्रों से निरन्तर दर्शन करने योग्य ।
“भवन्तम्” – आपको – श्री जिनेन्द्र देव को।

“दृष्ट्वा” – देख करके ।

“जनस्य” – मनुष्य का ।

“चक्षु:” – नेत्र।

“अन्यत्र” – और कहीं पर – अन्य किसी ठौर पर

“तोषम्” – सन्तोष को, परितोष को।

“न” – नहीं।

“उपयाति” – प्राप्त करता है – पाता है।

“दुग्ध- सिन्धोः” – क्षीर सागर के ।

“शशिकर- द्युति” –  चन्द्रमा की किरण के समान कांति वाली धवल – शुभ्र।

विशेषार्थ – (शशि) चन्द्र, उसकी (कर) किरण, उसकी (द्युति) कान्ति है जिसमें।

“पयः” – जल, क्षीर, दुग्ध को।

“पीत्वा” – पीकर ।

“क:” – कोन (पुरुष)?

“जलनिधे” – (लवण) समुद्र के । दरिया के।

“क्षारम्” – खारे।

“जलम्” – पानी को।

“रसितुम्” – चखने के लिए।

“इच्छेत्” – इच्छा करेगा !

Hindi Meaning (भावार्थ) of Bhaktamar Stotra/Mahima No-1​​1

बिना पलक झपकाए देखने योग्य हे भगवन आपको देखकर लोगो के नेत्र अन्य कही भी संतोष को प्राप्त नहीं होते है I जैसे चन्द्रमा की किरणों के चमक के समान क्षीर/दूध सागर के जल को पीकर कौन मनुस्य लवण समुद्र के खारे जल को चखने की इच्छा करेगा ? अर्थात्‌ कोई भी नहीं।

हे परम दर्शनीय जिनेन्द्र देव ।। आप इतने अधिक लावण्यमयी हैं कि निरन्तर टकटकी लगाकर टिमकार रहित नेत्रों से दर्शन करने के योग्य हैं । अर्थात् जो पुरुष आपको एक बार भी अच्छी तरह देख लेता है उसकी आंखों में आप ऐसे समा जाते हैं कि वह फिर अन्य किसी देव को देख कर सन्तुष्ट नहीं होता। जिस प्रकार चन्द्रमा की शुभ्र किरणों की कान्ति के समान धवल क्षीर सागर का मधुर जल पी चुकने के पश्चात् ऐसा कौन पुरुष होगा जो लवण समुद्र के खारे पानी को चखने की इच्छा करेगा ? अर्थात् कोई नहीं।

 

स्तुतिकर्ता ने पिछले पद्यों में क्रमश: श्री जिनेन्द्रदेव की स्तुति तथा चरित्र चर्चा की महिमा का गुणगान किया अब इस पच पद्य द्वारा वे भगवत् दर्शन का महत्व प्रतिपादित कर रहे है-

मानतुगाचार्य कहते हैं कि हे देवाधिदेव । आप इतने अधिक स्वरूपवान् है कि जिसकी आंखों में आप एक बार भी समा जाते हैं वह निरन्तर ही आप को टकटकी लगाकर देखता ही रह जाता है-उसके पलक तक भी नहीं झपकते फिर अन्य देवी देवताओं की ओर देखने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अर्थात् जो एक बार भी आपके दर्शन कर लेता है उसके चक्षुओं को जगत के अन्य पदार्थों के देखने से संतोष प्राप्त नहीं होता। क्षीर सागर के सुस्वादु मधुर निर्मल शीतल दुग्धोपम जल को पी चुकने के बाद ऐसा कौन पुरुष होगा जो लवण समुद्र के खारे पानी को पीने की इच्छा करेगा ? अर्थात् कोई नहीं।

इस छंद में यहाँ उपमालंकार की छटा देखने योग्य है। क्षीर सागर की उपमा वीतरागदेव से दी गई है और लवण समद्र की उपमा सरागी देवों से दी गई है।
कैसा है वीतराग देव का स्वरूप ? प्रशम रस से परिपूर्ण है और मुख-कमल अतीव हर्षोत्फुल्ल है । दृष्टि नासाग्र है । गोद कामिनी के संग से रहित है- सूनी है। युगल कर अस्त्रों-शस्त्रों से विहीन है तथा दिगम्बर मुद्रा कृत्रिम वस्त्राभूषणों से रहित स्वाभाविक यथाजात बालक की तरह निर्दोष निर्विकार है। जब कि सरागी देवी देवताओं का स्वरूप वीतरागी देव से सर्वथा विपरीत होता है । इसीलिए कहा गया है :–

वीतराग – मुखं दृष्ट्वा, पद्मराग समप्रभं । 

जन्म जन्म कृतं पापं दर्शनेन विनश्यति ।

ऐसी प्रशान्त भव्य वीतराग मुद्रा का अवलोकन करने के बाद विलासी विकृत मुद्रा को देखकर कौन भला मानुष प्रसन्न होगा? तीनों लोकों में सर्वोत्कृष्ट दर्शनीय तत्त्व यदि कोई है तो एक मात्र वीतराग परमात्मा ही है।